श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर देहरादून शहर के विभिन्न मंदिर रंग-बिरंगी आकर्षक रोशनी से जगमगा उठे। शाम करीब 6 बजे से ही मंदिरों में डीजे पर श्रीकृष्ण के भजनों की गूंज सुनाई देने लगी और धीरे-धीरे श्रद्धालुओं की भीड़ मंदिरों में उमड़ने लगी। जैसे-जैसे घड़ी की सुइयां रात 12 बजे की ओर बढ़ती गईं, वैसे-वैसे श्रद्धालुओं में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्साह और उत्सुकता चरम पर पहुंचती गई।
हालांकि जन्माष्टमी पर मंदिरों में श्रद्धालुओं की संतोष जनक भीड़ दिखाई दी, लेकिन अधिकांश मंदिरों में आकर्षक झांकियों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का अभाव देखने को मिला। देहरादून में ऐसे कई मंदिर हैं, जहां पूर्व वर्षों में जन्माष्टमी के अवसर पर भव्य झांकियां, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे। इन कार्यक्रमों के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं को दर्शाया जाता था और बड़ी संख्या में लोग इन्हें देखने पहुंचते थे। लेकिन इस बार आयोजन कर्ताओं ने लोगों को निराश किया है l
इस बार शहर के कई प्रमुख मंदिरों में झांकियों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के नाम पर अपेक्षाकृत सन्नाटा दिखाई दिया। हालांकि कुछ स्थानों पर श्रद्धालुओं के लिए आकर्षक झांकियां तैयार की गई थीं।
देहरादून के आराघर चौक स्थित मंदिर, पटेल नगर के स्वर्गापुरी आश्रम मंदिर तथा पथरी बाग स्थित राम मंदिर में जन्माष्टमी के अवसर पर विशेष झांकियां देखने को मिलीं। इनमें पथरी बाग स्थित राम मंदिर में सेवा समिति की ओर से बच्चों को विभिन्न धार्मिक पात्रों के रूप में तैयार कर आकर्षक झांकियां प्रस्तुत की गईं।
पथरी बाग राम मंदिर में प्रस्तुत झांकी में भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी से जुड़ा प्रसंग विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। झांकी में दिखाया गया कि सुदर्शन चक्र से श्रीकृष्ण की उंगली पर चोट लगने के बाद द्रौपदी ने अपनी साड़ी का कपड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर पट्टी बांधी। इसके बाद महाभारत के प्रसंग में द्रौपदी को दुशासन द्वारा बाल पकड़कर सभा में लाने और चीरहरण के दौरान भगवान श्रीकृष्ण द्वारा उनकी रक्षा किए जाने का दृश्य प्रस्तुत किया गया। इस झांकी ने श्रद्धालुओं का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।
शहर में कई बड़े और प्रसिद्ध मंदिर होने के बावजूद जन्माष्टमी जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व पर भव्य झांकियों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की कमी चर्चा का विषय बनी रही। श्रद्धालुओं का कहना था कि ऐसे आयोजनों के माध्यम से बच्चों और युवा पीढ़ी को भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं, भारतीय संस्कृति और सनातन परंपराओं से जोड़ने का अवसर मिलता है।
जन्माष्टमी पर मंदिरों में उमड़ी श्रद्धा के बीच यह सवाल भी सामने आया कि क्या धार्मिक आयोजनों को केवल पूजा-पाठ और सजावट तक सीमित कर दिया जा रहा है? यदि सनातन संस्कृति और परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है, तो मंदिर समितियों और सामाजिक संगठनों को सांस्कृतिक कार्यक्रमों एवं धार्मिक झांकियों के आयोजन पर भी विशेष ध्यान देना होगा।
