देश में महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माने जा रहे “नारी शक्ति वंदन संशोधन विधेयक” के संसद में पारित न हो पाने पर सामाजिक कार्यकर्ता ममता पांगती ने गहरी चिंता और निराशा व्यक्त की है।
मीडिया से बातचीत करते हुए ममता पांगती ने कहा कि भारत की कुल आबादी में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 50 प्रतिशत है, लेकिन संसद में उनका प्रतिनिधित्व अभी भी केवल 14 से 15 प्रतिशत तक सीमित है। कई राज्य विधानसभाओं में यह आंकड़ा 10 प्रतिशत से भी कम है, जो लोकतांत्रिक संतुलन के लिए चिंता का विषय है।
उन्होंने कहा कि प्रस्तावित विधेयक के तहत लोकसभा की 543 सीटों में से लगभग 181 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जा सकती थीं, जिससे राजनीति में महिलाओं की भागीदारी में ऐतिहासिक बढ़ोतरी संभव थी। साथ ही अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग की महिलाओं को भी समान अवसर मिलने की उम्मीद थी।
ममता पांगती ने पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को मिले आरक्षण के सकारात्मक परिणामों का हवाला देते हुए कहा कि महिला नेतृत्व ने शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और स्थानीय प्रशासन में उल्लेखनीय सुधार किए हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि महिलाओं का नेतृत्व प्रभावी और परिणामकारी होता है।
उन्होंने आगे कहा कि इस महत्वपूर्ण विधेयक का पारित न होना न केवल महिलाओं की उम्मीदों को ठेस पहुंचाता है, बल्कि देश के लोकतांत्रिक मूल्यों और समावेशी विकास की दिशा में भी एक ठहराव को दर्शाता है।
ममता पांगती ने केंद्र सरकार और सभी राजनीतिक दलों से अपील की कि इस मुद्दे को राजनीति से ऊपर उठाकर प्राथमिकता दी जाए और जल्द से जल्द इस विधेयक को पारित कर देश की आधी आबादी को उनका अधिकार सुनिश्चित किया जाए।
उन्होंने कहा कि यह केवल आरक्षण का विषय नहीं, बल्कि समानता, न्याय और एक सशक्त लोकतंत्र की आवश्यकता है
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