उत्तराखंड माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण और कल्याण नियम 2011 की व्याख्या करते हुए उत्तराखंड हाई कोर्ट ने इस संबंध में जिला मजिस्ट्रेट (DM) के अधिकार बताए। हाई कोर्ट ने कहा कि वरिष्ठ नागरिक के कब्जे वाली संपत्ति में हस्तक्षेप करने वाले अतिक्रमणकारी को बेदखल करने की मांग करने वाला आवेदन जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष मान्य होगा। माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत यह डीएम के समक्ष विचारणीय होगा।
लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, हाई कोर्ट के जस्टिस विवेक भारती शर्मा की पीठ ने एक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों, उत्तराखंड नियमों और विभिन्न न्यायालयों द्वारा लिए गए विचारों के संयुक्त अध्ययन से यह न्यायालय इस बात पर दृढ़ राय रखता है कि अधिनियम जिला मजिस्ट्रेट को वरिष्ठ नागरिकों के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करने का अधिकार देता है। अधिनियम के प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू करने की अनुमति देने के लिए ‘बेदखली’ की शक्ति की भी परिकल्पना करता है।
बेदखली का आदेश देने की ऐसी शक्ति इसमें निहित है और इसके विपरीत निर्णय लेने से वह उद्देश्य ही विफल हो जाएगा जिसके लिए अधिनियम बनाया गया था। यह कानून का एक स्थापित सिद्धांत है कि जहां एक अधिनियम अधिकार क्षेत्र प्रदान करता है, वहां यह निहित रूप से ऐसे सभी कार्य करने या ऐसे साधनों को नियोजित करने की शक्ति भी प्रदान करता है जो इसके निष्पादन के लिए आवश्यक हैं।
उत्तराखंड माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और कल्याण नियम, 2011 के नियम 19 में जिला मजिस्ट्रेट पर यह सुनिश्चित करने का कर्तव्य आरोपित किया गया है कि वरिष्ठ नागरिकों के जीवन और संपत्ति की सुरक्षा की जाए। कोर्ट ने कहा कि ‘सुरक्षा और सम्मान’ शब्द को अधिनियम के विभिन्न उद्देश्यों के प्रकाश में समझा जाना चाहिए, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करके सामाजिक न्याय की अवधारणा को मजबूत करना है कि बुजुर्ग लोग भयमुक्त जीवन जीएं।