राष्ट्रीय धारा के साथ ही चली देवभूमि, पीछे है यह वजह

 इसे 78.8 प्रतिशत साक्षरता का असर कहें या राष्ट्रीय विषयों के प्रति गहरी समझ और चिंतन-मनन, बात चाहे जो हो, चीन और नेपाल की सीमा से सटा उत्तराखंड राष्ट्रीय धारा के साथ ही कदम बढ़ाता आया है।राज्य का राजनीतिक परिदृश्य तो यही बयां कर रहा है। इस बार के लोकसभा चुनाव में भी यहां के मतदाताओं ने ऐसा ही किया है। यही नहीं, राज्य गठन के बाद से अब तक के आम चुनावों के आलोक में देखें तो यहां के मतदाता हमेशा से राजनीतिक स्थायित्व और विकास को महत्व देते आए हैं।

उत्तराखंड अगर राष्ट्रीय धारा के साथ चलता है तो इसके पीछे अनेक कारण समाहित हैं। अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटा यह राज्य सैनिक बहुल है। लगभग हर तीसरे परिवार से कोई न कोई व्यक्ति सेना और अर्द्धसैनिक बलों में है। यूं कहें कि राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय हित यहां की जनता के लिए सर्वाेपरि हैं।यही नहीं, विषय चाहे सीमाओं व आंतरिक सुरक्षा का हो अथवा विकास का, इन सभी पर यहां का मतदाता गहनता से चिंतन-मनन करता है। इसके लिए वह राजनीतिक स्थायित्व चाहता है।

यही मुख्य कारण भी हैं, जिनके चलते यहां का मतदाता राष्ट्रीय धारा के साथ चलता है। आंकड़ों को देखें तो लोकसभा की केवल पांच सीटों वाले इस राज्य ने जिसका भी साथ दिया, केंद्र में उसकी सरकार बनती आई है।बात चाहे वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव की हो या फिर वर्ष 2014 व 2019 की, इनमें मतदाताओं ने एक ही दल को पांचों सीटें देकर राजनीतिक स्थायित्व के लिए मतदान किया।

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