उत्तराखंड लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी वोटरों को लुभाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। देहरादून के दिल घंटाघर से 700 मीटर की दूरी पर है बिंदाल बस्ती। यहां के परिवारों की सबसे बड़ी चुनौती दो वक्त रोटी, कपड़ा और मकान और अन्य बुनियादी सुविधाएं हैं। देश में हो रहे लोकतंत्र के महायज्ञ की उन्हें बहुत जानकारी भी नहीं है।
यहां के लोगों का कहना है कि सांसद-विधायक के नाम पर वे सिर्फ पार्षद का नाम जानते हैं। बावजूद इसके वोट करने जरूर जाते हैं। उनका कहना है कि वोट किसे करना है यह भी चुनाव से एक रात पहले तय होता है। बंगाल, बिहार, झारखंड से लेकर पश्चिमी यूपी से आकर इस बस्ती में बसे लोगों में 300 वोटर हैं।
बस्ती तक पहुंचने का रास्ता बिंदाल से सटकर चलता है, जिसमें सड़ांध भरा पानी चल रहा है। पुल के नीचे पिलरों के बीच में घरौंदे बने हैं। मंगलवार दोपहर साढ़े 12 बजे नदी के बीचों-बीच सीमेंट के प्लेटफार्म पर ताश खेलने बस्ती के पुरुषों का झुंड बैठा है।
तो मोहल्ले की महिलाएं घर के बाहर रास्ते के किनारे बैठकर बातों में दिन काट रही हैं। बस्ती में न कोई झंडा है न कोई बैनर है। चुनाव को लेकर कोई चर्चा तक नहीं है। विधायक, सांसद कौन है कोई पता नहीं। इस चुनाव में भी अब तक कोई वोट मांगने तक नहीं आया।
बेजान बहती बिंदाल से बीमारियों का खतरा तो है ही, यहां नशे की स्थिति यह है कि चुनाव को लेकर पूछने पर एक व्यक्ति जवाब देते हैं शाम को आना, हर कोई प्रधान, मंत्री-संत्री की हैसियत में मिल जाएगा। महिलाएं जरूर बस्ती के भविष्य को लेकर चिंता जाहिर करती हैं।
कहती हैं जो बस्ती को तोड़ने से बचाएगा वोट तो उसी को देंगे। ये अलग बात है कि बस्ती वाले ही यह भी मान रहे थे कि अभी वोट को लेकर कुछ भी तय नहीं है। पूछने पर सिर्फ एक ही जवाब मिलता है पार्षद हैं, वही सब कुछ करते हैं, हम तो उन्हीं को जानते हैं। नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के नाम से बस्ती के लोग वाकिफ हैं।
बस्ती के मुद्दे
बस्ती का नियमितीकरण कर मालिकाना हक का मामला लटका
बिंदाल नदी की सफाई न होने और बरसात में बाढ़ से खतरा
नशा तस्करी और नशाखोरी की वजह से खराब होता माहौल
रोज कमाकर घर चलाते हैं, जिस दिन वोट होगा, वोट भी कर आएंगे। बाकी हम जैसे पहले थे, वैसे आज भी हैं कोई जीते, कोई हारे कोई फर्क नहीं पड़ता।
रामनाथ, रैक पिकर्स (कामगार)
वोट तो हर बार देते हैं लेकिन कोई करता तो कुछ भी नहीं है। सरकार से 1500 रुपये पेंशन मिल रही है, इस महंगाई में इतने में क्या परिवार पलेगा।
अमरीका देवी, गृहिणी
हमारे पास ताकत के नाम पर वोट ही तो है। नेता यहां आए, न आए, कोई फर्क नहीं पड़ता। वोट तो उसी को जाएगा जो हमारी चिंता करेगा।
कमलकांत, बिजली मिस्त्री
अभी कोई नेता वोट मांगने नहीं आया, आएगा तो सबकी बात लोग सुनेंगे ही। जो माहौल बनाकर जाएगा, लोग तो उसी को वोट करेंगे।